Saturday, March 4, 2017

मैं बंद कमरे में रोना चाहता हूँ

हत्या
बहुत मामूली बात हो गयी है
मेरे देश में
मेरे कान
यंत्रणापूर्ण चीखों से भर गये हैं
वो चीखें अब
नदी बन
सैलाब लिए
मेरी आँखों से बाहर आने को
बेताब हैं
मैं बंद कमरे में रोना चाहता हूँ
रात भर |
काश, मुझे इस वक्त
सर टिकाने को
मिल जाता
तुम्हारा कंधा
-तुम्हारा कवि सीरिज से


4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "ट्रेन में पढ़ी जाने वाली किताबें “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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