Saturday, March 30, 2013

टूटी नही है प्रतिबद्धता

समय के कालचक्र में रहकर भी 
टूटी नही है कवि की प्रतिबद्धता

उम्र कुछ बढ़ी जरूर है 
पर हौसला बुलंद है 
बूढ़े बरगद की तरह 

नई कोपलें फूटने लगी है फिर से 
उम्मीदे जगाने के लिए 
उन टूट चुके लोगों में ...
कमजोर पड़ती क्रांति
फिर बुलंद होती है


कवि भूल नही पाता
अपना कर्म
कूद पड़ता है फिर से
संघर्ष  की रणभूमि पर
योध्या बनकर 

तिमिर में भी लड़ता एक दीया 
तूफान को ललकारता 
लहरों से कहता -
आओ छुओ मुझे 
या बहाकर ले जाओ 

हम भी तो देखें 
हिम्मत तुम्हारी ....

Tuesday, March 26, 2013

होली और तुम्हारी याद


वे सारे रंग
जो साँझ के वक्त फैले हुए थे
क्षितिज पर
मैंने भर लिया है उन्हें अपनी आँखों में
तुम्हारे लिए

वर्षों से किताब के बीच में रखी हुई
गुलाब पंखुड़ी को भी निकाल लिया है
तुम्हारे कोमल गालों के गुलाल के लिए


तुम्हारे जाने के बाद से
मैंने किसी रंग को
अंग नही लगाया है
आज भी  मुझ पर चड़ा हुआ है
तुम्हारा ही रंग
चाहो तो देख लो आकर एकबार
दरअसल ये रंग ही
अब मेरी पहचान बन चुकी है

तुम भी  कहो  कुछ
अपने रंग के बारे में ....

Thursday, March 21, 2013

मैं मिला हूँ उस नदी से आज


एक नदी
जो निरंतर बहती है
हम सबके भीतर कहीं
वह नदी जिसने
देखा नही कभी कोई सूखा
वह नही जिसे प्यास नही लगी कभी
मैं मिला हूँ उस नदी से आज
अपने भीतर

यदि आप नही मिले
अपने भीतर बहते उस नदी से
देखा नही यदि उसकी धाराओं को
तब छोड़ दो उसे अकेला
उसकी लहरों के साथ उन्मुक्त
ताकी वह बहती रहे निरंतर
कभी मंद न पड़े लहरें उसकी
किसी हस्तक्षेप से

उसकी धाराओं में जीवन है
छोड़ दो उसे अकेला ,ताकि
हमारा अहंकार उसे सूखा न दें
निगल न लें उसे
ईर्ष्या की बाढ़
ऐसा होने पर
बह जायेगा सब कुछ
उस पानी में सड़ जायेगी इंसानियत
अशुद्ध हो जायेगा नदी का जल ....

Saturday, March 9, 2013

क्षणिकाएँ

1.

शुक्रिया करूँ उनका 

या 

हंसू खुद पर ...

मेरी हर बात को पसंद किया 


मेरे चेहरे की मासूमियत देख कर ..


2.

मज़हब का रंग न चढाओ 
मेरी वतनपरस्ती पर 
खून मेरा भी लाल है तुम्हारी तरह ...

3.

चलो अब तुमसे कोई
 शिकायत नही करूँगा 
तुम क्या हो , कौन हो 
        सोचना अकेले में कभी ......

4.

ऊपर से सूख चुके ज़ख्मों को 

कुरेदने में 


बहुत आनंद आता है उन्हें 

ये सभी सम्वेदनशीलता की चादर ओढ़े रहते हैं 

जब उतर जाती है घाव की ऊपरी परत 

और रिसने लगता है पानी 

ज़ख्म से
वे मुस्कुराते हैं ....


5.

उन्हें गम है 
कि हम दोस्त हैं 


वे चाहते हैं हमें 

लड़ते देखना 

ज़हर की पुड़िया लिए घूमते हैं कुछ लोग 

ये वही है 

जो व्याख्यान देते हैं

मित्रता के पक्ष में


6.

उन्होंने 


खोली बोतल शराब की मेरे लिए 


मैंने सिर्फ पानी मिलाया 

और मैं ही शराबी कहलाया

7.

कविताएँ उनकी भी छपी 
और उनकी भी 


अंतर कविताओं में नही 
तस्वीरों में था ....


बस एक को ही वाहवाही मिली ....

Thursday, March 7, 2013

महिला दिवस की हार्दिक बधाई के साथ


अपने ही मुद्दों से  
जुड़े सवालों पर वे बिखरे -बिखरे से हैं 
जहाँ होना था एकजुट 
वे टूटे हैं 
या तोड़े गये हैं 
कुछ ने तो राजनीति की 
जमकर 
और कुछ ने भटकाया है 
हक की लड़ाई यूँ नही लड़ी जाती
गुटों में बंट कर

हाथ की उँगलियों को जोड़कर
मुट्ठी बनाकर देखिये ,
कितनी मजबूत है

ये जो टीवी पर दिखाकर
कहानी घर -घर की
नारी को नारी से लड़ाने की साज़िस
सोचिये इस प्रश्न को कभी फुर्सत से

हक कोई देता नही किसी को
आसानी से
लड़कर लेना होगा
वजूद का सवाल जो है 


दिया हुआ हक छीन लें कब कोई 
ये भी किसे खबर ...?

मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से चीख़ कर

मान लीजिये कि कभी आप चीख़ कर रोना चाहते हैं किन्तु रो नहीं सकते ! कैसा लगता है तब ? तकलीफ़ होती है न ? मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से ...