Sunday, January 20, 2013

कितनी सुरक्षित है रात ?



चांदनी की पनाह में
कितनी सुरक्षित है रात |

देखा है सबने
पहाड़ों से घिरा हुआ
खामोश मैदान को

तभी अचानक आती है
कुछ तेज कदमों की आहट
कांप उठते हैं
ओस में भीगी हुई घास
सन्नाटा टूटता है
रात का
पहाड़ों पर दिखने लगती हैं
दरारें ..

उस पार गांव की झोपड़ी के द्वार पर
एक बूढ़ी माँ ताकती है
शहर में मजदूरी करने गया
अपने बेटे की राह .....||



Saturday, January 12, 2013

१९९६ में लिखी एक कविता


हम खो देंगे 
अपनी पहचान 
हमसे अधिक उन्हें भय है 
इस बात का 

हमारे मैले वस्त्र 
मैले तन 
उन्हें हौसला देते हैं 
हमें गाली देने का
चोर और नीच कहने का

हमारे पूर्वजों ने
हमें मजबूर किया गिडगिडाने को
मंदिरोंके पत्थर के आगे
जिन्हें उन्होंने ईश्वर कहा
और उम्मीद लगाई न्याय की

आओ उठाये हम
एक -एक पत्थर
पत्थर तोड़ने के लिए ...

Thursday, January 10, 2013

लिखने से अच्छी है ख़ामोशी ,

केवल शब्दों 
और अक्षरों के सहारे
व्यक्त नही करना चाहता 
आक्रोश ,संवेदनाएं 

चाहता हूँ 
वे सभी अक्षर और शब्द 
जो उबल रहे हैं 
मेरे और आपके भीतर 
क्रांति बनकर बाहर आयें 

वे सभी 
जो केवल झंडा लेकर कर रहे हैं 
बदलाव की मांग 
मैं देखना चाहता हूँ 
बदलाव उनकी भाषा की व्याकरण में 

औपचारिकता के नाम पर 
लिखने से अच्छी  है 
ख़ामोशी ,
खामोश मनुष्य के भीतर भी दबी रहती है 
एक बीज कविता ......

मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से चीख़ कर

मान लीजिये कि कभी आप चीख़ कर रोना चाहते हैं किन्तु रो नहीं सकते ! कैसा लगता है तब ? तकलीफ़ होती है न ? मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से ...