Thursday, September 1, 2011

खंडहर

शहर के बीचों -बीच
तन्हा खड़े 
खंडहर की दीवारों पर 
खुदे हुए हजारों नामों के बीच
मैंने कभी नहीं खोजा 
अपना नाम 
यूं  भी कभी
हिम्मत नहीं कर पाया , कि
पत्थरों पर लिखुँ 
मैं अपना नाम 
जब लिख नहीं पाया
कभी किसी दिल पर /

पत्थर तो  सह लेगा 
हर दर्द को 
दिल कहाँ सह पायेगा
नुकीले चुभन की पीड़ा ?
बेजुबान खंडहर की दीवारें 
चीखेगी नहीं कभी 
किन्तु अहसास है मुझे 
चुभन की पीड़ा की /

मेरे भी दिल पर कभी
लिखा था किसी ने 
अपना नाम 
एक लम्बी रेखा खींच कर 
आज कह नहीं सकता यकीन से 
कि -उसे याद है 
उनका  नाम मेरे दिल पर खुदा हुआ 
किन्तु-
बहते लहू धारा का  निशां
आज भी बाकी है
मेरे दिल पर //

वक्त हम पर हँस रहा है

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