Tuesday, November 10, 2009

बैठे रहो छांव में

बदन जलाती गर्मी में
तनिक बैठो
इस वृक्ष की छाव में
अब सुनो
पीपल के पत्तों की
खुसुर - पुसुर
क्या सुना तुमने ?
बातचीत या गीत ?
वृक्ष ही तो है
हमारे सच्चे मित्र ।
बैठे रहो यों ही
समय जाएगा बीत
दोनों की है यही रीत
हम मारते हैं
और
वृक्ष हमे बचाते हैं ।

नास्तिक हूँ फिर भी

नास्तिक हूँ
बावजूद इसके
भेजा था एक पत्र
उस काल्पनिक भगवान को
नही मालूम मुझे , कि
मैंने सही लिखा था उसका पता , या
ग़लत
मालूम नही उसे मिला कि नही अबतक
अपने लिए माँगा नही कुछ उस पत्र में मैंने
बस इतनी
गुजारिश की है मैंने , कि
अब कोई बिस्फोट न हो
इस धरती पर
मरे न कोई मासूम बेकसूर
और हो दुष्टों का नाश
बस
यही माँगा है
उस पत्र में
जो भेजा है मैंने उसे
अब तक कोई जबाव नही आया
न ही मेरा पत्र
लौट कर आया
और नही पूरी हुई मेरी तमन्ना
तो फिर क्या हुआ मेरे पत्र का
कहाँ पहुँचा आया डाकिया
मेरे पत्र को ?
क्या डाकिया को भी नही पता
उस भगवान का सही पता ?
या वो भी नास्तिक है मेरी तरह
इसीलिए
नही पंहुचाया मेरा पत्र उन तक
जो रहते हैं कंही
आस्मां के किसी कोने में
छुप कर
कोटि - कोटि मानव के मन में
आदर है उस भगवन के लिए
जो बसता है कहाँ नही मालूम उन्हें ।

Tuesday, November 3, 2009

भारत के मंत्री जी

कृषि मंत्री पवार
उनपर है क्रिकेट सवार
यमराज घूम रहे हैं
किसानो के खेतों में
मंत्री जी घूम रहे हैं
दुनिया भर के देशों में ।


हम देख रहे हैं आजकल
एक स्वप्ना
बने देश महान अपना
कुर्सी पर जो बैठे थे कलतक
जनपथ के बंगलो में उनका कब्जा है आजतक ।


देश का शासन
देता है हमे आश्वाशन
वर्षों तक वेही करेंगे शासन
और भी देतें हैं बहुत कुछ
कोई भूखा पेट नही सोयेगा
कोई बच्चा अब नही रोयेगा

भूखा है पेट
तो पानी पीकर लेट
पानी अब कहाँ मिलता है
बिना पैसे
पहले जैसे ।


क्रिकेट के हर गेंद पर
अब होता है चर्चा
कौन करे अब समय
कृषि पर समय खर्चा ?




चाँद के आंसूं

सुना है चाँद पर
पानी मिला है , और
वैज्ञानिक परेशान है
पानी का स्रोत खोजने में
उन्हें कोई बता दे , कि
वो पानी दरसल पानी नही
चाँद के आंसूं हैं
चाँद आहत है
आदमी की करतूतों से ।

मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से चीख़ कर

मान लीजिये कि कभी आप चीख़ कर रोना चाहते हैं किन्तु रो नहीं सकते ! कैसा लगता है तब ? तकलीफ़ होती है न ? मेरा देश रोना चाहता है बहुत जोर से ...