Friday, February 16, 2018

खोजो


खोजो कि कुछ खो गया है
पर खोजो यह मान कर कि सब कुछ खो गया है
खोजो कि खो गई हैं
हमारी संवेदनाएं
बच्चों का बचपन खो गया है
खोजो, कविताओं से गायब हुए प्रेम को
और सभ्यता की भाषा खो गई है
खोजो कि देश का लोकतंत्र कहाँ खो गया है
सत्ता का विवेक खो गया है
नागरिक का अधिकार खो गया है
मानचित्र तो मौजूद है
कहीं मेरा देश खो गया है
उसे खोजो धरती की आखिरी छोर तक
खोजो कि,
किसान का खेत खो गया है
पेड़ की चिड़िया खो गई है
खोजो इस भीड़ में कहीं
मेरी तनहाई 
खो गई है
खोजो मुझे कि
मैं खो गया हूँ

Tuesday, February 6, 2018

सूरदास खुश हैं ........



आज फिर हाथ लगी पुरानी डायरी , इसमें अधूरी पड़ी एक कविता कुछ सुधार के साथ .........

प्रेम करता हूँ कहना 
आसान हो सकता है 
पर उस प्रेम को को महसूस करे कोई 
सबसे मुश्किल यही है 
दरअसल प्रेम लिखना और प्रेम करना दो अलग-अलग क्रियाएं हैं 
किन्तु दोनों के लिए ही प्रेम का अहसास बेहद जरुरी है
जरा सोचिए जब आप 'प्रेम' शब्द को लिखते हैं 
उस वक्त आपके मन में कैसा भाव उठता है ? 
तब कुछ मीठा सा या कुछ खालीपन भी उभर सकता है मन में 
और उस अहसास को 
हम अलग -अलग शब्दों से व्यक्त करते हैं शायद 
अपने उस प्रेम को हम 
अक्सर मुकम्मल शब्द नहीं दे पाते 
जो काम हम शब्दों से नहीं कर पाते 
अक्सर वह बात व्यक्त हो जाती है आँखों से 
स्पर्श से महसूस कर लेता है कोई 
उस प्रेम को
आजकल हमारी आँखें सूख रही हैं 
हाथ खुरदरे हो चुके हैं 
इसलिए लगातर असमर्थ हो रहे हैं हम 
उस प्रेम को व्यक्त करने में 
आँखों से, 
स्पर्श से !
हमारी भाषा कड़वी हो चुकी है |
हम बाजार में घूम रहे हैं नये नये गैजेट की तलाश में 
जिसके सहारे 
हम क्षण भर में लिख भेज देना चाहते हैं अपना प्रेम 
तभी पता चलता है कि 
किसी गाँव में 
खाप ने मौत की सज़ा सुनाई है एक प्रेमी को 
किसी मौलाना ने जारी किया है कोई फ़तवा 
और किसी माँ-बाप ने मार दिया अपनी संतान को 
प्रेम के अपराध में
बगल में कहीं एक 
राधा-कृष्ण के मंदिर के बाहर मीराबाई 
उदास आँखें लिए 
बैठी हैं 
सूरदास खुश है कि 
वह नेत्रहीन हैं |

रचनाकाल : 22 मार्च , 2014 

Friday, February 2, 2018

तो हैरानी के सिवा बचता क्या है ?

थ्री पीस सूट त्याग कर
घुटनों तक धोती में आकर ही
मोहनदास
महात्मा बने
अब कोई
उनके चरखे के साथ तस्वीर खिंचवाकर
शांतिदूत बनने की तमन्ना रख लें
तो कोई क्या करें !
राजकुमार सिद्धार्थ
लुम्बिनी का राज महल छोड़कर
जंगल -जंगल ज्ञान की तलाश में भटककर ही तो
बने थे गौतम बुद्ध |
अब कोई लाखों का सूट पहिनकर
खुद को फकीर कहें
तो कोई क्या करें ?
हिंसा जिसके शब्दों में व्याप्त हों
वो करें शांति और अमन की बात
तो हैरानी के सिवा बचता क्या है ?
सुकरात के ज़हर के प्याले के बारे में
जिसे कोई ज्ञान नहीं
वह करें त्याग की बातें
तो इसे आधुनिक भाषा में
कामेडी ही कहा जायेगा
अब उसकी हरकतों पर हैरानी नहीं होती
बस हंसी छूट जाती है
उसके तालाबों में
कितनी मछलियाँ जीवित बची होंगी
गोधरा को याद करते हुए
बताइएगा मुझे |

Monday, January 29, 2018

महात्मा के लिए

सम्भव है कि
गोडसे के उपासक भी
सुबह तुम्हारी समाधि पर जाएंगे
तुम्हें श्रद्धांजलि देने
बिलकुल वैसे ही जाएंगे
जिस तरह जाते हैं वो
तुम्हारे आश्रम में
तुम्हारे चरखे पर बैठ तस्वीर खिंचवाने के लिए
किन्तु वो कभी भी नहीं कहेगा
गलत था गोडसे |
सुकून से रहो बापू अपनी समाधि में
यहाँ आग लगी हुई है चारों ओर
यह आग फ़ैल रही है तेजी से पूरे मुल्क में
जंगल की आग की तरह
बुझाने की जिम्मेदारी जिन पर थी
अब वे ही इस आग को हवा दे रहे हैं !
आपका चश्मा अब
विज्ञापन के काम आता है
और आपका चरखा
कैलेंडर की तस्वीर के लिए
आपकी छड़ी और घड़ी का पता नहीं मुझे
आपकी बकरी कहीं नहीं मिली
आपके बन्दर चारों ओर घूम रहे हैं किन्तु
सत्य के साथ आपका अनुभव भी तो ऐसा ही था न ?
बापू तुम दुःखी मत होना
हत्या को अब पाप नहीं मानते यहाँ के लोग |
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Monday, January 22, 2018

हक़ीकत से वाकिफ़ होते हुए भी

और एकदिन पड़ा रहूँगा
किसी सड़क पर
सूखे हुए किसी पत्ते की तरह
जानता हूँ
भविष्य का आभास होते हुए भी
विचलित नहीं हुआ हूँ अबतक
ये उस प्रेम का कमाल है शायद
जिसकी कल्पना के दायरे में
केवल तुम्हारा चेहरा है
हक़ीकत से वाकिफ़ होते हुए भी
बहुत रूमानी लगता है मुझे
मेरे प्रेम की काल्पनिक दुनिया |
बिजुरी / २३ जनवरी २०१६

Wednesday, January 17, 2018

मैं थका हुआ एक मजदूर और तुम्हारा प्रेमी हूँ

कितनी नफ़रत
और हिंसा फैल चुकी है
हमारे आस-पास
ख़बरों के शब्दों में विष घुल चुका है
समाचार वाचक भी चिल्ला रहा है 
जैसे वह हमें किसी निज़ाम की तरह हुक्म दे रहा हो
मन बेचैन हो उठता है
तन थक कर चूर होने के बाद भी नींद नहीं आती
आँखें भीग जाती है
और जुबान पर छा जाती है ख़ामोशी
सुबह उठ कर सूरज की किरणों को
ओस की बूंदों को चुमते हुए देखना चाहता हूँ
किन्तु ऐसा हो नहीं पाता
मैं बहुत दिनों से अधूरी पड़ी उस प्रेम कविता को
पूरा करना चाहता हूँ
जिसे तुम्हारे लिए शुरू किया था
पर ऐसा हो नहीं पाता
मेरी सारी इच्छाएं
एक मजदूर की इच्छा है
जो कभी पूरी नहीं होती
जबकि इस दुनिया में
सबसे अधिक श्रम वही करता है
और नगर में पकते शाहीभोज की महक से
अपनी रूह भर लेता है
अब बहुत थक चुका हूँ
विश्राम करना चाहता हूँ
और चाहता हूँ कि
तुम भी कभी भूले से
मुझे याद करो
किन्तु यह ज़रूरी नहीं
तुम मेरी इच्छानुसार कुछ करो
मैं थका हुआ एक मजदूर
और तुम्हारा प्रेमी हूँ
किसी सियासत का
हुक्मरान नहीं हूँ |

Sunday, January 14, 2018

जबकि वादा जीवन भर का था

मैं चाहता हूँ
मुझे भी मिले सज़ा-ए-मौत
लोकतंत्र में
प्रेम करने के अपराध में
किसी राष्ट्रवादी शासक के इशारे पर 
किसी अदालत द्वारा
मेरी फांसी से ठीक पहले
पूछे जल्लाद मुझसे
मेरी आखिरी इच्छा
और मैं कहूँ -
उससे मिलना चाहता हूँ आखिरी बार
जिससे मैंने प्रेम किया
और जिसने छोड़ दिया मेरा साथ
मेरी मौत से पहले
जबकि वादा
जीवन भर का था

रचनाकाल : 15 जनवरी 2017 

खोजो

खोजो कि कुछ खो गया है पर खोजो यह मान कर कि सब कुछ खो गया है खोजो कि खो गई हैं हमारी संवेदनाएं बच्चों का बचपन खो गया है खोजो, कवित...